16 JUN 2016 NIRJALA EKADASHI

Nirjala Ekadashi – Importance, Story and Observing Ekadashi Vrat

Nirjala Ekadashi

9th June 2014 is Nirjala Ekadasi

Nirjala Ekadashi is the most important and significant Ekadashis. As per Hindu calendar Ekadashi falls on the eleventh day of every lunar fortnight. So, there are 24 Ekadasis in a year. Ekadashi Vrat is considered highly pious and is assumed to be one of the ways to attain Moksha.

Nirjala  Ekadashi falls on the Shukla paksha in the month of Jyestha. It is also called “Jyeshtha Shukla Ekadashi” or “Bhimsaini Ekadashi”. It is considered as one of the most rewarding fast.Lord Krishna

Importance of Nirjala Ekadashi

The greatness of Nirjala Ekadasi was explained by Sage Vyasa.

  • It is equal to going on pilgrimage.
  • It provides virtue of all 24 Ekadashi.
  • It washes away all sin.
  • Grants happiness, prosperity, longevity and moksha (salvation).
  • This Ekadasi happens before monsoon season and therefore it is also helps in cleansing the body.

How to Observe Nirjala Ekadashi Vrat

Nirjala means without water. Hence, fast is observed without water and food. It is considered as the most strict and hence, most sacred of all Ekadashis. This fast is extremely difficult to follow as it falls in the hot Indian summer. The 24 hours long fast begins from sunrise on Nirjala Ekadashi to sunrise the next day. People fast and offer puja to Lord Vishnu on this day.

The fast begins with Sandhyavandanam – a prayer. This prayer is performed in the evening before Nirjala Ekadashi, i.e. on 10th lunar day. After prayer devotee takes only one meal, without rice (as rice eating is prohibited). The strict fast continuous throughout Ekadashi. It gets over on next morning. Devotees offer prayer, tulsi, fruits, and sweets to Lord Vishnu and then finish their fast.

Rituals and celebrations of Nirjala EkadasiPicture1

  • Offer Puja to Lord Vishnu and seek his grace.
  • Bath the idol of Lord Vishnu with Panchamrit.
  • Wash with clean water and then dressed in new clothes.
  • Offer flowers, incense, water, lamps and a hand fan.
  • In evening, worship Vishnu with Durva grass.
  • Visit nearby Vishnu temple and observe Jagran at night.
  • Chant bhajans, Vishnu Sahasranama and other slokas dedicated to Lord Vishnu
  • Donate clothes, food grains, umbrellas, hand-fans, pitchers filled with water, gold etc.

Story of Nirjala Ekadashi Vrat

Bhimsen – the second Pandava brother and big eater wanted to keep Ekadashi Vrat. All his brothers, wife Draupadi and mother Kunti observed Vrat on 24 Ekadasis throughout the year and request him to do the same. But he was unable to perform the ritual due to unbearable hunger pangs. Bhima, was upset due to his weak determination. He was also sacred of dishonouring to Lord Vishnu. So, when Maharishi Vyasa visited them Bhima asked him to find a solution. Sage Vyasa advised him to observe single Nirjala Ekadasi fasting. This fast would compensate for not observing all Ekadashi fasting in a year. Bhima performed the fast with an ease but on the morning of very next day he became unconscious. Then he offered Ganga water with Tulsi to end up his day fast. Due to this legend Nirjala Ekadashi is also known as Bhimseni Ekadashi, Bhima Ekadashi or Pandava Ekadashi.

Onlineprasad.com wishes a very happy and devoted Nirjala Ekadashi

निर्जला एकादशी व्रत कथा

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी

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FILE

भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।

अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।

यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।

व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।

जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी के फल…

निर्जला एकादशी के फल से मिलेगा परम पुण्य

aajtak.in [Edited by. दीपल सिंह]

नई दिल्ली, 16 जून 2016 | अपडेटेड: 10:09 IST

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हिंदू धर्म में व्रत का एक अलग महत्व है. उपवास करने की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विशेषताएं हैं. सभी व्रतों में एकादशी के व्रत की बहुत मान्यता है. माना जाता है कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का उपवास करने से परम पुण्य का फल प्राप्त होता है.

आइए जानें इस व्रत के नियम और विशेषताएं:

निर्जला एकादशी का महत्व

इस एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान है. निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति पाता है. इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. पौराणिक मान्यता है कि भूखे न रहने वाले पांच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर फलस्वरूप मृत्यू के बाद स्वर्ग प्राप्त किया था. इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ.

एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है. इस दिन जल कलश, गाय का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है. वहीं निर्जला एकादशी के दिन खाने के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है. इस व्रत में पानी भी नहीं पिया जाता है यानी निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है.

व्रत विधि

जल पिए बिना व्रत करने के कारण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘निर्जला एकादशी’ कहा जाता है. इस साल यह तिथि 16 जून गुरुवार को पड़ रही है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इस एकादशी को करने से साल की सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है. इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करें. फिर सूरज को अर्घ्य दें.

इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें. साथ ही क्षमतानुसार गौदान, वस्त्रदान, छाता, फल, जल से भरा कलश आदि चीजों का दान करना चाहिए. इस व्रत को करने के बाद अगले दिन द्वादशी तिथि में ब्रम्ह बेला में उठकर स्नान, दान तथा ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए. इस दिन चीनी मिले पानी को घड़े में भर कर आम, खरबूजा के साथ मंदिर में रखने या ब्राह्मण को दान करने से पुण्य की मिलता है.

एकादशी पूजा

निर्जला एकादशी का व्रत करने के लिए एक दिन पहले दशमी तिथि से ही व्रत के नियम शुरू कर देने चाहिए. इस एकादशी में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए. इस दिन व्रत करने के अलावा जप, तप, गंगा स्नान या किसी भी सरोवर, नदी में स्नान आदि करना शुभ रहता है. इस व्रत में सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा कि जाती है और व्रत कथा को सुना जाता है.

पूजा-पाठ के बाद ब्राह्माणों और गरीबों को दक्षिणा, मिष्ठान आदि दान देने चाहिए. अगर हो सके तो उपवास वाली रात जागरण करना चाहिए. कुछ व्रत रखने वाले इस दिन शाम को दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का ग्रहण कर लेते हैं.

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16 JUN 2016 GAYATRI JAYANTI

Gayatri Jayanti 2015

Gayatri-Mata-With-Gayatri-Mantra-Wallpaper
Origin

Gayatri Jayanti is the day of appearance of Goddess Gayatri, who is the personification of divine knowledge. It is a festival celebrated by Hindus all around the world. This year Gayatri Jayanti falls on 28th May, which is the day of Jyestha Shukla Paksha Ekadashi.

Significance of Gayatri Jayanti

1. Also known as Veda Mata, her four heads represent the Vedas, and her fifth symbolizes the almighty.

2. Gayatri Mata has been widely revered by Hindus since the Vedic times, and the Gayatri Mantra is one of the main mantras of Hinduism.

3. According to legend, the sage Vishvamitra had revealed the Gayatri Mantra to the world on the auspicious day of Gayatri Jayanti.

4. She had arrived on earth with divine knowledge at a time when society was ignorant and disorderly. Vedic society was then enlightened by the supreme knowledge of the Vedas.

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gayatri jayanti

Gayatri Jayanti

As per the mythological beliefs it is said that Goddess Gayatri made her appearance on the 11th day of the Shukla Paksha of the Jyeshta month.

Many people accept her as the mother of all Gods and some believe that she is the culmination of three Gods, namely- Laxmi, Parvati and Saraswati. Scholars also indicate that Sage Vishwamitra first uttered the Gayatri Mantra on the Jyeshta Shukla Ekadashi day. And from then on this day is observed as Gayatri Jayanti day.

It is said that she appeared to remove ignorance existent amongst the people. And to do so she appeared in the form of knowledge. Later on, this knowledge was spread out to the whole world by Sage Vishwamitra. Regarding Goddess Gayatris marriage to Lord Brahma the story runs that Brahma married her when his first wife Sabitri was late for a yagna. And Brahma had to start the yagna with his wife at time. Thus, in Sabitris absence he married Gayatri to start the yagna People offer special prayers and pujas to Gayatri Mata on this day. This day of worship is a community affair and people from different walks of life gather to offer their respect and devotion in the form of prayers a pujas.

These pujas are done either by Pandits or by elderly experienced persons. Satsangs are also organized in this day and the Gayatri Mantra is chanted by all the people. Such is the importance and significance of Gayatri mantra that if one chants the Gayatri mantra then no other mantras are needed to be chanted because this mantra is highly sacred.

To get the best results from the Gayatri mantra one needs to recite it thrice a day, preferably in the morning, afternoon and evening. It is believed that if one chants the Gayatri mantra incessantly then that person would not face the miseries and hardships of life. The mythological stories state that Goddess Gayatri, who is considered as the Mother of all Vedas has ten hands and five heads.

The ten hands of Goddess Gayatri are said to bear the symbols of Lord Vishnu and her five heads represents the four Vedas and the fifth one symbolizes the almighty itself. She is seen as sitting on a lotus flower

गायत्री मंत्र का जाप करने से उत्साह एवं सकारात्मकता से आपकी त्वचा में चमक आती है, तामसिकता से घृणा, और परमार्थ में रूचि जागती है, पूर्वाभास होने लगता है, आशीर्वाद देने की शक्ति बढ़ती है, नेत्रों में तेज आता है, स्वप्न सिद्ध हो जाते हैं, क्रोध शांत होता है, ज्ञान की वृद्धि होती है।

पंडित ‘विशाल’ दयानंद शास्‍त्री बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति जीवन की समस्याओं से बहुत त्रस्त है तो उसकी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। वह पीपल, शमी, वट, गूलर, पाकर की समिधाएं लेकर एक पात्र में कच्चा दूध भरकर रख लें एवं उस दूध के सामने एक हजार गायत्री मंत्र का जाप करें। इसके बाद एक-एक समिधा को दूध में स्पर्श करा कर गायत्री मंत्र का जप करते हुए अग्रि में होम करने से समस्त परेशानियों एवं दरिद्रता से मुक्ति मिल जाती है।

विद्यार्थीयों के लिए: गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है किंतु विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है। विद्यार्थियों को पढऩे में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से निजात मिल जाती है।

दरिद्रता के नाश के लिए : यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है तथा व्यय अधिक है तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्रता का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।

संतान संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए : किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।

पढ़ें : कुछ इस तरह कीजिए मां गायत्री की उपासना

शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए : यदि कोई व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहा हो तो उसे प्रतिदिन या विशेषकर मंगलवार, अमावस्या अथवा रविवार को लाल वस्त्र पहनकर माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे एवं पीछे क्लीं बीज मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाकार एक सौ आठ बार जाप करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मित्रों में सद्भाव, परिवार में एकता होती है तथा न्यायालयों आदि कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।

विवाह कार्य में देरी हो रही हो तो : यदि किसी भी जातक के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही हो तो सोमवार को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए ह्रीं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर एक सौ आठ बार जाप करने से विवाह कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं। यह साधना स्त्री पुरुष दोनों कर सकते हैं।

पढ़ें : वेदों से हुई उत्पत्ति इसलिए हैं वेदमाता

यदि किसी रोग के कारण परेशानियां हों तो : यदि किसी रोग से परेशान है और रोग से मुक्ति जल्दी चाहते हैं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर रख लें एवं उसके सामने लाल आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र के साथ ऐं ह्रीं क्लीं का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के पश्चात जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने देने से उसके भी रोग का नाश होता हैं।

रोग निवारण के लिए: किसी भी शुभ मुहूर्त में दूध, दही, घी एवं शहद को मिलाकर एक हजार गायत्री मंत्रों के साथ हवन करने से चेचक, आंखों के रोग एवं पेट के रोग समाप्त हो जाते हैं। इसमें समिधाएं पीपल की होना चाहिए। गायत्री मंत्रों के साथ नारियल का बुरा एवं घी का हवन करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है। नारियल के बुरे मे यदि शहद का प्रयोग किया जाए तो सौभाग्य में वृद्धि होती हैं।

“gayatri-jayanti”

गायत्री मंत्र के जप से मिलते हैं ये लाभ

गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है किंतु विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है।

Wed, 24 Jun 2015 01:02 PM (IST)

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कुछ इस तरह कीजिए मां गायत्री की उपासना

तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए।

Thu, 28 May 2015 07:03 PM (IST)

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इसीलिए कलयुग में अमृत की तरह है गायत्री मंत्र

आत्म- प्राप्ति करने की दिव्य दृष्टि जिस बुद्धि से प्राप्त होती है, उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा होती है।

Thu, 28 May 2015 07:02 PM (IST)

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पांचवे वेद से जानिए मां गायत्री मंत्र की महिमा

इस ग्रन्थ को हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है।

Thu, 28 May 2015 07:02 PM (IST)

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यह मंत्र है जगत की आत्मा, मानते हैं अनेक धर्म संप्रदाय

तत्त्वदर्शी ऋषियों ने कहा है दुर्लभा सर्वमंत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता अर्थात्- प्रणव (ऊं) से युक्त गायत्री सभी मन्त्रों में दुर्लभ है।

Wed, 27 May 2015 03:44 PM (IST)

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जानिए गायत्री मंत्र के जप से जुड़ी जरूरी बातें

यह मंत्र निरोगी जीवन के साथ-साथ यश, प्रसिद्धि, धन व ऐश्वर्य देने वाली होती है।

Wed, 27 May 2015 03:25 PM (IST)

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गायत्री मंत्र जैसा ही इस्लाम धर्म में सूरह फातेह

जरूरत यही है कि कर्मकाण्ड के कलेवर के साथ गायत्री विद्या के प्राण को भी जाग्रत् किया जाए।

Wed, 27 May 2015 03:24 PM (IST)

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वेदों से हुई उत्पत्ति इसलिए हैं वेदमाता

हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा जाता है अर्थात सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है।

Wed, 27 May 2015 03:20 PM (IST)

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गायत्री जयंती

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को देवी गायत्री का अवतरण माना जाता है। इस दिन को गायत्री जयंती के रूप में मनाते हैं।

Thu, 21 May 2015 03:00 PM (IST)

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14 JUN 2016 MITHUN SANKRANTI/RAJA PARBA

Mithuna Sankranti 2016 – June 15 (Wednesday)

Mithuna Sankranti is celebrated marking the occasion of Sun moving into another constellation called Gemini or Mithuna. Known as Mithuna Sankramanam in South India, it is regarded as one of the most auspicious occasions as per Hindu traditions and customs. People in Orissa celebrate it as Raja Sankranti, a four day long festival consisting of several interesting activities. It marks the onset of the agricultural year all across Odisha with being referred to as Raja Parba. More specifically, people welcome first rains officially by celebrating this festival.

Legends of Mithuna Sankranti

Mithuna Sankranti is celebrated for four days because of an interesting mythological depiction associated with it. Goddess Earth or Bhudevi is the wife of Lord Vishnu who is known to experience menstruation covering the period of initial three days. The grand celebrations is held in the form of Vasumati Gadhua, which marks the fourth and final day on which a prosperous bath is given to Bhudevi. Lord Jagannatha Temple in Puri consists of a silver idol of Bhudevi adorned with grandeur.

Mithuna Sankranti – A Reflection of Indian Customs and Traditions

Unmarried girls dress in beautiful attire and celebrate Raja Parba along with their friends and family. Raja Dholi Khela is an interesting event observed as a part of the festival in Odisha during which girls wishing for a good husband get onto swings. As a part of the traditions, girls sing Raja gita and others play card games and Ludo.

Raja Sankranti Celebrations in Odisha 2016

The four-day festival begins with the first day observed as Pahili Raja. Several traditional events are organized such as swaying upon various swings named as Ram Doli, Dandi Doli and so on. The second day is celebrated as Raja, which is simply known as Mithuna Sankranti. Basi Raja is the third day, which marks the completion of menstruation period.

Vasumati Snan – An Ode to Bhudevi

People wearing traditional Odiya costumes observe the final day of Mithuna Sankranti by showing their gratitude to Goddess Earth. Referred locally as Bhudevi, devotees perform special pujas to seek her divine blessings apart from a sacred bath to a grinding stone. Perhaps, the stone is considered to be a replica of Bhudevi that people consider to celebrate.

It is beautifully decorated with turmeric powder, different flowers, sandalwood and vermilion. The festival bears significance to nature and womenfolk in a direct fashion. The way earth gets ready to receive early rainfall, young girls too are known to get prepared for a perfect matrimonial alliance.

Everyone looks forward to celebrate the specific event of tying rope swings to banyan trees to have a good time with their family members, relatives and friends. The whole atmosphere turns into a colorful one with girls trying to outdo each other by wearing beautiful clothes.  Gotipua dances too are organized in villages reflecting typical Odiya culture.

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Raja
Festivity
Raja Parba or Mithuna Sankranti is a four-day-long festival and the second day signifies beginning of the solar month of Mithuna from, which the season of rains starts. Wikipedia
2016 Date: June 15, 2016
2017 Date: June 15, 2017
Observances: Unmarried girls try new fashion or traditional Saree and Alatha in feet, more
Type of holiday: Religious celebration
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14 JUN 2016 GANGA DUSSEHRA

Varanasi: Devotees take holy dip in Ganga on ‘Ganga Dussehra’

ANI  |  Varanasi (Uttar Pradesh) June 14, 2016 Last Updated at 08:48 IST

People in Varanasi took a holy dip in river Ganges on Tuesday to celebrate the festival ‘Ganga Dussehra’, which marks the descent of river Ganges on the earth.

The priests performed rituals on the banks of the river and chanted hymns as the devotees offered prayers and sought blessings.

“Today is Ganga Dussehra and everyone comes to take a dip in the holy river. We pray for the wellbeing of the family,” said a devotee Savitri Singh.

“On this day Maa Ganga came down to earth from heaven and gave salvation to the 60,000 ancestors of Raja Bhagirath. The divine occasion washes away sins of many lives,” said a priest.

Every year the occasion of ‘Ganga Dussehra’ is celebrated by performing several rites and rituals of Ganga pooja to commemorate her.

गंगा दशहरा 2016 | Ganga Dashahara 2016 | Ganga Dussehra

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस वर्ष गंगा दशहरा 14 जून 2016, के दिन मनाया जाएगा. स्कंदपुराण के अनुसार गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को किसी भी पवित्र नदी पर जाकर स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए. इससे वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. यदि कोई मनुष्य पवित्र नदी तक नहीं जा पाता तब वह अपने घर पास की किसी नदी पर स्नान करें.

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को संवत्सर का मुख कहा गया है. इसलिए इस इस दिन दान और स्नान का ही अत्यधिक महत्व है. वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी. इस पवित्र नदी में स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते है.

गंगा दशहरे का महत्व | Importance of Ganga Dusshera

भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की  दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.

गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए. ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.

गंगा दशहरे का फल | Results of Ganga Dusshera

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं. इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है.

पूजा विधि | Pooja Vidhi

इस दिन पवित्र नदी गंगा जी में स्नान किया जाता है. यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकता है. गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए. गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :-

“ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:”

इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भगीरथी का नाम मंत्र से पूजन करना चाहिए. इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए. गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए. जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए.

यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है तब वह भी दस प्रकार की वस्तुओं का करता है तो अच्छा होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए. दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए. जब गंगा नदी में स्नान करें तब दस बार डुबकी लगानी चाहिए.

गंगा जी की कथा | Story of Goddess Ganga

इस दिन सुबह स्नान, दान तथा पूजन के उपरांत कथा भी सुनी जाती है जो इस प्रकार से है :-

प्राचीनकाल में अयोध्या के राजा सगर थे. महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र थे. एक बार सगर महाराज ने अश्वमेघ यज्ञ करने की सोची और अश्वमेघ यज्ञ के घोडे. को छोड़ दिया. राजा इन्द्र यह यज्ञ असफल करना चाहते थे और उन्होंने अश्वमेघ का घोड़ा महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया. राजा सगर के साठ हजार पुत्र इस घोड़े को ढूंढते हुए आश्रम में पहुंचे और घोड़े को देखते ही चोर-चोर चिल्लाने लगे. इससे महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई और जैसे ही उन्होंने अपने नेत्र खोले राजा सगर के साठ हजार पुत्रों में से एक भी जीवित नहीं बचा. सभी जलकर भस्म हो गये.

राजा सगर, उनके बाद अंशुमान और फिर महाराज दिलीप तीनों ने मृतात्माओं की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की ताकि वह गंगा को धरती पर ला सकें किन्तु सफल नहीं हो पाए और अपने प्राण त्याग दिए. गंगा को इसलिए लाना पड़ रहा था क्योंकि पृथ्वी का सारा जल अगस्त्य ऋषि पी गये थे और पुर्वजों की शांति तथा तर्पण के लिए कोई नदी नहीं बची थी.

महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की और एक दिन ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और भगीरथ को वर मांगने के लिए कहा तब भगीरथ ने गंगा जी को अपने साथ धरती पर ले जाने की बात कही जिससे वह अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति कर सकें. ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं गंगा को तुम्हारे साथ भेज तो दूंगा लेकिन उसके अति तीव्र वेग को सहन करेगा? इसके लिए तुम्हें भगवान शिव की शरण लेनी चाहिए वही तुम्हारी मदद करेगें.

अब भगीरथ भगवान शिव की तपस्या एक टांग पर खड़े होकर करते हैं. भगवान शिव भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने को तैयार हो जाते हैं. गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड. देते हैं. इस प्रकार से गंगा के पानी से भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल होता है.

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13 JUN 2016 MAHESH NAVAMI

 

 

 

महेश नवमी की कथा एवम इतिहास story-and-history-of-mahesh-navami

story-and-history-of-mahesh-navami

वेदो, पुराणो एवम शास्त्रो के अनुसार ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महेश नवमी मनाई जाती है। तदनुसार इस वर्ष सोमवार 13 जून 2016 को महेश नवमी मनाई जाएगी। महेश नवमी पुरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है की माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के स्त्रोत भगवान शिव जी है। अतः माहेश्वरी समाज के लोग इस पर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाते है।

माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति

धार्मिक मान्यताओ के अनुसार महेश नवमी का उत्सव महेश अर्थात भगवान शिव जी एवम माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान शंकर की कृपा से माहेश्वरी समाज की उतपत्ति हुई थी।

महेश नवमी की कथा

धार्मिक ग्रंथो के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज क्षत्रिय वंश के थे। एक दिन जब इनके वंशज शिकार पर थे तो इनके शिकार कार्यविधि से ऋषियों के यज्ञ में विघ्न उतपन्न हो गया। जिस कारण ऋषियों ने इनलोगो को श्राप दे दिया था की तुम्हारे वंश का पतन हो जायेगा। माहेश्वरी समाज इसी श्राप के कारण ग्रसित हो गया था । किन्तु ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन भगवान शिव जी की कृपा से उन्हें श्राप से मुक्ति मिल गई तथा शिव जी ने इस समाज को अपना नाम दिया। इसलिए इस दिन से यह समाज महेशवरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान शिव जी की आज्ञानुसार माहेश्वरी समाज ने क्षत्रिय कर्म को छोड़कर वैश्य कर्म को अपना लिया। अतः आज भी माहेश्वरी समाज वैश्य रूप में पहचाने जाते है।

धार्मिक महत्व एवम पूजन कार्यक्रम

माहेश्वरी समाज के लिए महेश नवमी पर्व का अत्यधिक महत्व है। इस उत्स्व की तैयारी 2-3 दिन पूर्व से की जाती है। महेश नवमी के दिन धार्मिक एवम सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन श्रद्धा तथा भक्ति की आस्था को प्रकट कर भगवान शिव जी एवम माँ पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करते है। महेश नवमी उत्स्व से यह सन्देश मानव जगत में फैलता है कि हिंसा का त्याग कर जगत कल्याण और परोपकार के लिए कर्म करना चाहिए। भगवान शिव जी ने यह सन्देश सर्वप्रथम माहेश्वरी समाज के पूर्वज को दिया था। इस प्रकार महेश नवमी की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए भगवान शिव जी और माता पार्वती की जय। महेश नवमी की कथा एवम इतिहास story-and-history-of-mahesh-navami
( प्रवीण कुमार )

महेश नवमी की कथा एवम इतिहास story-and-history-of-mahesh-navami

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वेदो, पुराणो एवम शास्त्रो के अनुसार ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महेश नवमी मनाई जाती है। तदनुसार इस वर्ष सोमवार 13 जून 2016 को महेश नवमी मनाई जाएगी। महेश नवमी पुरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है की माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के स्त्रोत भगवान शिव जी है। अतः माहेश्वरी समाज के लोग इस पर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाते है।

माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति

धार्मिक मान्यताओ के अनुसार महेश नवमी का उत्सव महेश अर्थात भगवान शिव जी एवम माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान शंकर की कृपा से माहेश्वरी समाज की उतपत्ति हुई थी।

महेश नवमी की कथा

धार्मिक ग्रंथो के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज क्षत्रिय वंश के थे। एक दिन जब इनके वंशज शिकार पर थे तो इनके शिकार कार्यविधि से ऋषियों के यज्ञ में विघ्न उतपन्न हो गया। जिस कारण ऋषियों ने इनलोगो को श्राप दे दिया था की तुम्हारे वंश का पतन हो जायेगा। माहेश्वरी समाज इसी श्राप के कारण ग्रसित हो गया था । किन्तु ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन भगवान शिव जी की कृपा से उन्हें श्राप से मुक्ति मिल गई तथा शिव जी ने इस समाज को अपना नाम दिया। इसलिए इस दिन से यह समाज महेशवरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान शिव जी की आज्ञानुसार माहेश्वरी समाज ने क्षत्रिय कर्म को छोड़कर वैश्य कर्म को अपना लिया। अतः आज भी माहेश्वरी समाज वैश्य रूप में पहचाने जाते है।

धार्मिक महत्व एवम पूजन कार्यक्रम

माहेश्वरी समाज के लिए महेश नवमी पर्व का अत्यधिक महत्व है। इस उत्स्व की तैयारी 2-3 दिन पूर्व से की जाती है। महेश नवमी के दिन धार्मिक एवम सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन श्रद्धा तथा भक्ति की आस्था को प्रकट कर भगवान शिव जी एवम माँ पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करते है। महेश नवमी उत्स्व से यह सन्देश मानव जगत में फैलता है कि हिंसा का त्याग कर जगत कल्याण और परोपकार के लिए कर्म करना चाहिए। भगवान शिव जी ने यह सन्देश सर्वप्रथम माहेश्वरी समाज के पूर्वज को दिया था। इस प्रकार महेश नवमी की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए भगवान शिव जी और माता पार्वती की जय। महेश नवमी की कथा एवम इतिहास story-and-history-of-mahesh-navami

( प्रवीण कुमार )

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12 JUN 2016 MASIK DURGASHTAMI

Apr 22, 2015

Masik Durga Ashtami Vrat Vidhi

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Masik Durgashtami Vrat is observed month on month on the Ashtami Tithi (eighth day) of Shukla Paksha (bright half of the lunar month). This is a day-long fast stretches from morning till evening. The day is marked with a customary puja to Mother Durga as per the injunctions given in the sacred scriptures. This is one of the most popular kinds of vrats observed in the Hindu tradition which is believed to bestow the ultimate blessings of Mother Durga.

 

Though the Durgashtami vrat can be observed every month, the most important ones of the year falls on the day called Mahashtami or the Ashtami day occurring in the month of Ashwin. Notably, this is the time when the Shardiya Navratri festival stretching over nine days is celebrated with great fervor. Those intending to observe Masik Durgashtami usually observe the month puja in a simple way while performing an elaborate puja on the Mahashtami.

 

On the dedicated day of Durgashtami, people worship the eight manifestations of Goddess Durga with great devotion. The dishes that are specially prepared at home and offered to Mother Durga during the puja include Kheer, Halwa and others.

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In the Durgashtami puja tradition, there is a customary practice of worshipping a small girl child denoting the nine manifestations of Mother Durga. During the puja, the chosen girl is offered Halwa Puri and dakshina in a way propitiating Mother Durga. 

Durga Puja is dedicated to the eighth manifestation of Mother Durga namely Maha Gauri. This is one of the most benign and pleasing forms of Durga that has especially manifested to bless the devotees and relieve them of their sufferings and problems. Accordingly, those who observe the Masik Durgashtami with diligence as per the procedures have reaped great results as assured in the scriptures that has made this fast a highly popular one.

 

In the typical puja set up, a Ghat or holy pot is established on an altar. Usually, a copper pot is advised for this though other variations like panchaloga (combination of five metals), silver or earthen pots are also allowed as per availability. The Ghat is decorated with water and spices inside and mango leaves and coconut kept on top of it with the face pointing downwards. An image of Mother Durga is installed on the coconut or the Ghat.

 

The observer of the vrat should take flowers in both the hands and offer at the idol of Mother Durga while chanting the divine names of Mother Gauri. This process installs the Shakti of Mother Durga in the Ghat set up. The puja includes divine bath and sixteen types of offerings to the idol. Panchamrit or a salad made of five items including curd, milk, honey, cow’s ghee and sugar is the most important component of this puja. Some of the typical offerings made include fruits, dry fruits and resins, betel leaves and nuts, cloves and cardamom. At the end of the puja, arti or waving of camphor is done seven times.

 

The end of the puja is marked by inviting nine small girls, washing their feet with holy water and performing puja to them with offerings. Once all this is over, the day long fast is completed invoking the blessings of Mother Durga.

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5 JUN 2016 BRAHMA DEV

Brahma

Brahma is the Hindu god (deva) of creation and one of the Trimurti, the others being Vishnu and Shiva. He is not to be confused with the Supreme Cosmic Spirit in Hindu Vedanta philosophy known as Brahman. Also, in Sanskrit Grammer, Brahman is Nominative Singular of generic word Brahman, as Aatma is Nominative Singular for Aatman. Brahaman and Aatman are same in Vedanta Philosphy, the Para-Aatma (Supersoul) and Jeeva Aatma (Individual Soul) are Brahman. His consort is Saraswati, the goddess of learning. Brahma is often identified with Prajapati, a Vedic deity.

According to the Puranas, Brahma is self-born (without mother) in the lotus flower which grew from the navel of Vishnu at the beginning of the universe. This explains his name Nabhija (born from the navel). Another legend says that Brahma was born in water. In this he deposited a seed that later became the golden egg. From this golden egg, Brahma the creator was born, as Hiranyagarbha. The remaining materials of this golden egg expanded into the Brahmanda or Universe. Being born in water, Brahma is also called Kanja (born in water). Brahma is said also to be the son of the Supreme Being, Brahman and the female energy known as Prakrti or Maya.

At the beginning of the process of creation, Brahma created eleven Prajapatis (used in another sense), who are believed to be the fathers of the human race. The Manusmriti enumerates them as Marichi, Atri, Angirasa, Pulastya, Pulaha, Kratu, Vasishtha, Prachetas or Daksha, Bhrigu, and Narada. He is also said to have created the seven great sages or the Saptarishi to help him create the universe. However since all these sons of his were born out of his mind rather than body, they are called Manas Putras or mind-sons.

Within Vedic and Puranic scripture Brahma is described as only occasionally interfering in the affairs of the other devas (gods), and even more rarely in mortal affairs. He did force Soma to give Tara back to her husband, Brihaspati. He is considered the father of Dharma and Atri.

Brahma

From Wikipedia, the free encyclopedia
This article is about the Hindu god of creation. For other uses, see Brahma (disambiguation).
For the genderless metaphysical concept of Ultimate Reality in Hindu philosophy, see Brahman.
Brahma
Brahma

Brahma, the god who created knowledge and the universe[1]
Devanagari ब्रह्मा
Sanskrittransliteration Brahma
Affiliation Trimurti
Abode Satyaloka
(Land of Truth)
Consort Saraswati,[2][3]Savitri[4]
Children Narada, Vashistha
Mount Haṃsa (swan/goose)

Brahma (/ˈbrəmɑː/; Brahmā) is the creator god in the Trimurti of Hinduism. He has four faces, looking in the four directions.[1] Brahma is also known as Svayambhu (self-born),[5] Vāgīśa (Lord of Speech), and the creator of the four Vedas, one from each of his mouths.[1][6] Brahma is identified with the Vedic god Prajapati, as well as linked to Kama and Hiranyagarbha (the cosmic egg),[7][8] he is more prominently mentioned in the post-Vedic Hindu epics and the mythologies in the Puranas. In the epics, he is conflated with Purusha.[1] Brahma, along with Vishnu and Shiva, is part of a Hindu Trinity, however, ancient Hindu texts mention other trinities of gods or goddesses which does not include Brahma.[9][10][note 1]

While Brahma is often credited as the creator of the universe and various beings in it, several Puranas describe him being born from a lotus emerging from the navel of the god Vishnu. Other Puranas suggest that he is born from Shiva or his aspects,[12] or he is a supreme god in diverse versions of Hindu mythology.[7] Brahma, along with Vishnu and Shiva, is also viewed as a different form of Brahman, the ultimate formless metaphysical reality and cosmic soul in Hinduism.[10][8]

Brahma does not enjoy popular worship in present-age Hinduism and has lesser importance than the other members of the Trimurti, Vishnu and Shiva. Brahma is revered in ancient texts, yet rarely worshipped as a primary deity in India.[13] Very few temples dedicated to him exist in India; the most famous being the Brahma Temple, Pushkar in Rajasthan.[14] Brahma temples are found outside India, such as in Thailand at the Erawan Shrine inBangkok.[15]

Etymology[edit]

Brahma sculpture at the 12th century Chennakesava temple at Somanathapura, Karnataka.

The origins of Brahma are uncertain, in part because several related words such as one for Ultimate Reality (Brahman), and priest (Brahmin) are found in the Vedic literature. The existence of a distinct deity named Brahma is evidenced in late Vedic text.[16] A distinction between spiritual concept of Brahman, and deity Brahma, is that the former is gender neutral abstract metaphysical concept in Hinduism,[17] while the latter is one of the many masculine gods in Hindu mythology.[18] The spiritual concept of Brahman is far older, and some scholars suggest deity Brahma may have emerged as a personal conception and visible icon of the impersonal universal principle called Brahman.[16]

In Sanskrit grammar, the noun stem brahman forms two distinct nouns; one is a neuter noun bráhman, whose nominative singular form is brahma; this noun has a generalized and abstract meaning.[19]

Contrasted to the neuter noun is the masculine noun brahmán, whose nominative singular form is Brahma.[note 2] This noun is used to refer to a person, and as the proper name of a deity Brahma it is the subject matter of the present article.

History[edit]

Vedic literature[edit]

One of the earliest mention of Brahma with Vishnu and Shiva is in the fifth Prapathaka (lesson) of the Maitrayaniya Upanishad, probably composed in late 1st millennium BCE. Brahma is discussed in verse 5,1 also called theKutsayana Hymn first, and expounded in verse 5,2.[20][21]

In the pantheistic Kutsayana Hymn,[20] the Upanishad asserts that one’s Soul is Brahman, and this Ultimate Reality, Cosmic Universal or God is within each living being. It equates the Atman (Soul, Self) within to be Brahma and various alternate manifestations of Brahman, as follows, “Thou art Brahma, thou art Vishnu, thou art Rudra (Shiva), thou art Agni, Varuna, Vayu, Indra, thou art All.”[20][22]

In verse 5,2 Brahma, Vishnu and Shiva are mapped into the theory of Guṇa, that is qualities, psyche and innate tendencies the text describes can be found in all living beings.[22][23] This chapter of the Maitri Upanishad asserts that the universe emerged from darkness (Tamas), first as passion characterized by action qua action (Rajas), which then refined and differentiated into purity and goodness (Sattva).[20][22] Of these three qualities, Rajas is then mapped to Brahma, as follows:[24]

Now then, that part of him which belongs to Tamas, that, O students of sacred knowledge (Brahmacharins), is this Rudra.
That part of him which belongs to Rajas, that O students of sacred knowledge, is this Brahma.
That part of him which belongs to Sattva, that O students of sacred knowledge, is this Vishnu.
Verily, that One became threefold, became eightfold, elevenfold, twelvefold, into infinite fold.
This Being (neuter) entered all beings, he became the overlord of all beings.
That is the Atman (Soul, Self) within and without – yea, within and without !

While the Maitri Upanishad maps Brahma with one of the elements of Guṇa theory of Hinduism, the text does not depict him as one of the trifunctional elements of the Hindu Trimurti idea found in later Puranic literature.[25]

Post-Vedic, Epics and Puranas[edit]

In Puranic mythology, Brahma emerges from a lotus risen from Vishnu’s navel while he rests on the serpent Shesha

The post-Vedic texts of Hinduism offer multiple theories of cosmogony, many involving Brahma. These include Sarga (primary creation of universe) and Visarga (secondary creation), ideas related to the Indian thought that there are two levels of reality, one primary that is unchanging (metaphysical) and other secondary that is always changing (empirical), and that all observed reality of the latter is in an endless repeating cycle of existence, that cosmos and life we experience is continually created, evolved, dissolved and then re-created.[26] The primary creator is extensively discussed in Vedic cosmogonies with Brahman or Purusha or Devi among the terms used for the primary creator,[26][27] while the Vedic and post-Vedic texts name different gods and goddesses as secondary creators (often Brahma in post-Vedic texts), and in some cases a different god or goddess is the secondary creator at the start of each cosmic cycle (kalpa, aeon).[26][28]

Brahma is a “secondary creator” as described in the Mahabharata and Puranas, and among the most studied and described.[29][30][31] Born from a lotus emerging from the navel of Vishnu, Brahma creates all the forms in the universe, but not the primordial universe itself.[32] In contrast, the Shiva-focussed Puranas describe Brahma and Vishnu to have been created by Ardhanarishvara, that is half Shiva and half Parvati; or alternatively, Brahma was born from Rudra, or Vishnu, Shiva and Brahma creating each other cyclically in different aeons (kalpa).[33] Thus in most Puranic texts, Brahma’s creative activity depends on the presence and power of a higher god.[34]

In the Bhagavata Purana, Brahma is portrayed several times as the one who rises from the “Ocean of Causes”.[35] Brahma, states this Purana, emerges at the moment when time and universe is born, inside a lotus rooted in the navel of Hari (deity Vishnu, whose praise is the primary focus in the Purana). The myth asserts that Brahma is drowsy, errs and is temporarily incompetent as he puts together the universe.[35] He then becomes aware of his confusion and drowsiness, meditates as an ascetic, then realizes Hari in his heart, sees the beginning and end of universe, and then his creative powers are revived. Brahma, states Bhagavata Purana, thereafter combines Prakriti(nature, matter) and Purusha (spirit, soul) to create a dazzling variety of living creatures, and tempest of casual nexus.[35] The Bhagavata Purana thus attributes the creation of Maya to Brahma, wherein he creates for the sake of creation, imbuing everything with both the good and the evil, the material and the spiritual, a beginning and an end.[36]

The Puranas describe Brahma as the deity creating time. They correlate human time to Brahma’s time, such as a mahākalpa being a large cosmic period, correlating to one day and one night in Brahma’s existence.[34]

The stories about Brahma in various Puranas are diverse and inconsistent. In Skanda Purana, for example, goddess Parvati is called the “mother of the universe”, and she is credited with creating Brahma, gods and the three worlds. She is the one, states Skanda Purana, who combined the three Gunas – Sattva, Rajas and Tamas – into matter (Prakrti) to create the empirically observed world.[37]

The Vedic discussion of Brahma as a Rajas-quality god expands in the Puranic and Tantric literature. However, these texts state that his wife Saraswati has Sattva (quality of balance, harmony, goodness, purity, holistic, constructive, creative, positive, peaceful, virtuous), thus complementing Brahma’s Rajas (quality of passion, activity, neither good nor bad and sometimes either, action qua action, individualizing, driven, dynamic).[38][39][40]

Iconography[edit]

A 19th century roundel of Brahma, depicts him as a four-headed, red-complexioned aged man, who holds the Vedas, a ladle and a lotus in his hands.

Brahma is traditionally depicted with four faces and four arms.[41] Each face of his points to a cardinal direction. His hands hold no weapons, rather symbols of knowledge and creation. In one hand he holds the sacred texts ofVedas, in second he holds mala (rosary beads) symbolizing time, in third he holds a ladle symbolizing means to feed sacrificial fire, and in fourth a utensil with water symbolizing the means where all creation emanates from. His four mouths are credited with creating the four Vedas.[1] He is often depicted with a white beard, implying his sage like experience. He sits on lotus, dressed in white (or red, pink), with his vehicle (vahana) – hansa, a swan or goose – nearby.[41][42]

Chapter 51 of Manasara-Silpasastra, an ancient design manual in Sanskrit for making Murti and temples, states that Brahma statue should be golden in color.[4] The text recommends that the statue have four faces and four arms, have jata-mukuta-mandita (matted hair of an ascetic), and wear a diadem (crown).[4] Two of his hands should be in refuge granting and gift giving mudra, while he should be shown with kundika (water pot), akshamala (rosary), a small and a large sruk-sruva (laddles used in yajna ceremonies).[4] The text details the different proportions of the murti, describes the ornaments, and suggests that the idol wear chira (bark strip) as lower garment, and either be alone or be accompanied with goddesses Sarasvati on his right and Savitri on his left.[4]

Brahma’s consort is the goddess Saraswati. She is considered to be “the embodiment of his power, the instrument of creation and the energy that drives his actions”.[43]

Temples[edit]

Brahma at the Meenakshi Amman Temple, Tamil Nadu, India

India[edit]

Though almost all Hindu religious rites involve prayer to Brahma, very few temples are dedicated to his worship. Among the most prominent is Brahma Temple, Pushkar. Once a year, on Kartik Poornima, the full moon night of the Hindu lunar month of Kartik (October – November), a religious festival is held in Brahma’s honour. Thousands of pilgrims come to bathe in the holy Pushkar Lake adjacent to the temple. There is a temple in Asotra village in Balotrataluka of Rajasthan’s Barmer district, which is known as Kheteshwar Brahmadham Tirtha.

Temples to Brahma also exist in Tirunavaya in Kerala. The Trimurti temple and the temple dedicated to Brahma accompanied by Ganesha, located outside Padmanabhaswamy Temple in Thiruvananthapuram, Kerala, is also famous. He is also a part of the Trimurti in Thripaya Trimurti Temple and Mithrananthapuram Trimurti Temple in Kerala. Regular pujas are held for Brahma at the temple in Tirunavaya, and during Navratris, this temple comes to life with multi-varied festivities.

Also in the temple town of Kumbakonam in the Thanjavur district of Tamil Nadu and in Kodumudi in the Erode District of Tamil Nadu. There is also a shrine for Brahma within the Brahmapureeswarar Temple in Tiruchirappalli.

There is a temple dedicated to Brahma in the temple town of Srikalahasti near Tirupati, Andhra Pradesh.

7 feet height of Chatrumukha (Four Faces) Brahma temple at Bangalore, Karnataka.

In the coastal state of Goa, a shrine belonging to the fifth century, in the small and remote village of Carambolim in the Sattari Taluka in the northeast region of the state is found.

Famous murti of Brahma exists at Mangalwedha, 52 km from the Solapur district of Maharashtra and in Sopara near Mumbai.

There is a 12th-century temple dedicated to him in Khedbrahma, Gujarat.

Other temples dedicated to Brahma[edit]

Left: 15th-century seated Brahma, produced in north-central Thailand;
Middle: 12th-century Brahma with missing book and water pot, Cambodia;
Right: 9th-century Brahma in Prambanan temple, Yogyakarta, Indonesia.

Southeast Asia[edit]

The four-faced Brahma (Phra Phrom) statue, Thailand.

The largest and most famous shrine to Brahma may be found in Cambodia’s Angkor Wat.[citation needed] One of the three largest temples in the 9th-century Prambanan temples complex in Yogyakarta, central Java (Indonesia) is dedicated to Brahma, the other two to Shiva (largest of three) and Vishnu respectively.[44] The temple dedicated to Brahma is on southern side of Śiva temple.

A statue of Brahma is present at the Erawan Shrine in Bangkok, and continues to be revered in modern times.[15] The golden dome of the Government House of Thailand also contains a statue of Phra Phrom (Thai representation of Brahma). An early 18th-century painting at Wat Yai Suwannaram in Phetchaburi city of Thailand shows Brahma.[45]

The country name of Burma is derived from Brahma, and in medieval texts it is referred to as Brahma-desa.[46][47]

Duration of Brahma’s day[edit]

With regard to Brahma’s day and night, each consists of 14 of his hours or 4.32 billion human years. “Brahma has four heads” (Śrīmad Bhāgavatam 12.8.2–5).[48]

Nomenclature[edit]

Brahma is regionally spelled as Sanskrit: ब्रह्मदेव, Telugu: బ్రహ్మ and Tamil: ப்ரம்மா.

See also[edit]

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