16 JUN 2016 NIRJALA EKADASHI

Nirjala Ekadashi – Importance, Story and Observing Ekadashi Vrat

Nirjala Ekadashi

9th June 2014 is Nirjala Ekadasi

Nirjala Ekadashi is the most important and significant Ekadashis. As per Hindu calendar Ekadashi falls on the eleventh day of every lunar fortnight. So, there are 24 Ekadasis in a year. Ekadashi Vrat is considered highly pious and is assumed to be one of the ways to attain Moksha.

Nirjala  Ekadashi falls on the Shukla paksha in the month of Jyestha. It is also called “Jyeshtha Shukla Ekadashi” or “Bhimsaini Ekadashi”. It is considered as one of the most rewarding fast.Lord Krishna

Importance of Nirjala Ekadashi

The greatness of Nirjala Ekadasi was explained by Sage Vyasa.

  • It is equal to going on pilgrimage.
  • It provides virtue of all 24 Ekadashi.
  • It washes away all sin.
  • Grants happiness, prosperity, longevity and moksha (salvation).
  • This Ekadasi happens before monsoon season and therefore it is also helps in cleansing the body.

How to Observe Nirjala Ekadashi Vrat

Nirjala means without water. Hence, fast is observed without water and food. It is considered as the most strict and hence, most sacred of all Ekadashis. This fast is extremely difficult to follow as it falls in the hot Indian summer. The 24 hours long fast begins from sunrise on Nirjala Ekadashi to sunrise the next day. People fast and offer puja to Lord Vishnu on this day.

The fast begins with Sandhyavandanam – a prayer. This prayer is performed in the evening before Nirjala Ekadashi, i.e. on 10th lunar day. After prayer devotee takes only one meal, without rice (as rice eating is prohibited). The strict fast continuous throughout Ekadashi. It gets over on next morning. Devotees offer prayer, tulsi, fruits, and sweets to Lord Vishnu and then finish their fast.

Rituals and celebrations of Nirjala EkadasiPicture1

  • Offer Puja to Lord Vishnu and seek his grace.
  • Bath the idol of Lord Vishnu with Panchamrit.
  • Wash with clean water and then dressed in new clothes.
  • Offer flowers, incense, water, lamps and a hand fan.
  • In evening, worship Vishnu with Durva grass.
  • Visit nearby Vishnu temple and observe Jagran at night.
  • Chant bhajans, Vishnu Sahasranama and other slokas dedicated to Lord Vishnu
  • Donate clothes, food grains, umbrellas, hand-fans, pitchers filled with water, gold etc.

Story of Nirjala Ekadashi Vrat

Bhimsen – the second Pandava brother and big eater wanted to keep Ekadashi Vrat. All his brothers, wife Draupadi and mother Kunti observed Vrat on 24 Ekadasis throughout the year and request him to do the same. But he was unable to perform the ritual due to unbearable hunger pangs. Bhima, was upset due to his weak determination. He was also sacred of dishonouring to Lord Vishnu. So, when Maharishi Vyasa visited them Bhima asked him to find a solution. Sage Vyasa advised him to observe single Nirjala Ekadasi fasting. This fast would compensate for not observing all Ekadashi fasting in a year. Bhima performed the fast with an ease but on the morning of very next day he became unconscious. Then he offered Ganga water with Tulsi to end up his day fast. Due to this legend Nirjala Ekadashi is also known as Bhimseni Ekadashi, Bhima Ekadashi or Pandava Ekadashi.

Onlineprasad.com wishes a very happy and devoted Nirjala Ekadashi

निर्जला एकादशी व्रत कथा

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी

WD|

FILE

भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।

अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।

यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।

व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।

जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी के फल…

निर्जला एकादशी के फल से मिलेगा परम पुण्य

aajtak.in [Edited by. दीपल सिंह]

नई दिल्ली, 16 जून 2016 | अपडेटेड: 10:09 IST

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हिंदू धर्म में व्रत का एक अलग महत्व है. उपवास करने की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विशेषताएं हैं. सभी व्रतों में एकादशी के व्रत की बहुत मान्यता है. माना जाता है कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का उपवास करने से परम पुण्य का फल प्राप्त होता है.

आइए जानें इस व्रत के नियम और विशेषताएं:

निर्जला एकादशी का महत्व

इस एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान है. निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति पाता है. इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. पौराणिक मान्यता है कि भूखे न रहने वाले पांच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर फलस्वरूप मृत्यू के बाद स्वर्ग प्राप्त किया था. इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ.

एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है. इस दिन जल कलश, गाय का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है. वहीं निर्जला एकादशी के दिन खाने के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है. इस व्रत में पानी भी नहीं पिया जाता है यानी निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है.

व्रत विधि

जल पिए बिना व्रत करने के कारण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘निर्जला एकादशी’ कहा जाता है. इस साल यह तिथि 16 जून गुरुवार को पड़ रही है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इस एकादशी को करने से साल की सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है. इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करें. फिर सूरज को अर्घ्य दें.

इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें. साथ ही क्षमतानुसार गौदान, वस्त्रदान, छाता, फल, जल से भरा कलश आदि चीजों का दान करना चाहिए. इस व्रत को करने के बाद अगले दिन द्वादशी तिथि में ब्रम्ह बेला में उठकर स्नान, दान तथा ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए. इस दिन चीनी मिले पानी को घड़े में भर कर आम, खरबूजा के साथ मंदिर में रखने या ब्राह्मण को दान करने से पुण्य की मिलता है.

एकादशी पूजा

निर्जला एकादशी का व्रत करने के लिए एक दिन पहले दशमी तिथि से ही व्रत के नियम शुरू कर देने चाहिए. इस एकादशी में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए. इस दिन व्रत करने के अलावा जप, तप, गंगा स्नान या किसी भी सरोवर, नदी में स्नान आदि करना शुभ रहता है. इस व्रत में सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा कि जाती है और व्रत कथा को सुना जाता है.

पूजा-पाठ के बाद ब्राह्माणों और गरीबों को दक्षिणा, मिष्ठान आदि दान देने चाहिए. अगर हो सके तो उपवास वाली रात जागरण करना चाहिए. कुछ व्रत रखने वाले इस दिन शाम को दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का ग्रहण कर लेते हैं.

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